एक व्यक्ति... || Vaibhav Vyas

एक व्यक्ति कामकाज की उलझनों से मुक्त होने के लिए ध्यान करने लगा। जमीन पर बैठता है, सुखासन लगाता है और उसके बाद आंख बंद करके कभी किसी मंत्र के साथ, कभी श्वांसों की प्रक्रियां के साथ धन की ओर जाने का प्रयास करता है। 

ध्यान की ओर आने से पहले वो ये तय करके आया था कि ध्यान से मुझे कोई आनन्द नहीं मिलेगा। वरन् जो ये उलझने चल रही है, इससे थोड़ा दूर हो पाऊंगा। मन शांत हो पाएगा। जॉब में इतनी पॉलिटिक्स है, घर में खींचतान कई बार सामने होती है। 

जब भी परिवर्तन की ओर जाता हूं तो लोग अवरोध के साथ होते है। रूटीन इतना बिगड़ा हुआ है कि शारीरिक स्तर पर भी कुछ परेशानियां महसूस होती है। बहुत सुना है कि ध्यान की ओर जाने से सुलझने मिलने लगती है। 

परन्तु पहले ही दिन जब वो व्यक्ति पूरा मन बनाकर ध्यान की ओर गया तो उस दिन बच्चें भी जल्दी उठ गए और घर में खेलने-कुदने की आवाजों के साथ शोर होने लगा, मन और ज्यादा विचलित हो गया। परेशानियां अधिक घेरती हुई नजर आने लगी कि सुबह भी शांति नहीं है। इन्हें भी आज ही जल्दी उठना था, मन के क्रोध को दबाएं, वो व्यक्ति अगले दिन पुनः ध्यान की ओर जाता है, उसी समय बत्ती गुल हो जाती है और एयर कंडिशनर काम करना बंद कर देता है। अब पसीने से तरबतर वो महानुभाव ये सोचते है कि आज भी कोई सिरा नहीं है कि ध्यान कर पाऊं। अब वो पुनः कोई नई प्रक्रिया ध्यान के लिए खोजते है।

तो उसके साथ उन्हें मंत्रों के प्रभाव की जानकारी मिलती है। अगले दिन मंत्र के साथ ध्यान लगाने का प्रयास करते है। तो अवचेतन में एक भय पैठ जाता है कि कहीं कोई त्रुटि हो गई तो, अर्थ का अनर्थ ना हो जाएं। उस दिन भी ध्यान लगाने की कोई शुरूआत नहीं हो पाती। कई दिन कई विफल प्रयास परन्तु एक ही आस कि आखिरकार ध्यान लगेगा। 

कभी विचार इतनी तेजी से आक्रमण करते कि श्वांस और तीव्र हो जाती है, परन्तु उस व्यक्ति ने प्रयास नहीं छोड़ा। एक दिन सुबह-सुबह घर में कपड़े धोए जा रहे थे, तभी उस चप-चप की आवाज के साथ उनका तारतम्य बैठ गया। मन से विचार गायब हो गए, और उसी आवाज में मन रमता चला गया। उसे कुछ देर बाद बर्तन मांझे जाने की आवाज आई, तो उसमें भी पुनः एक लय सुनाई देने लगी। जो भी आवाजें बाहर से आकर इतने दिन विचलित कर रही थी, आज वो ही आवाजें एक लय के साथ नजर आ रही थी। जो समय दो से तीन मिनट भी मुश्किल था, अब वो समय उसी दिन तीस मिनट में बदल गया, ये बड़ा बदलाव था।

अगले दिन की उत्सकुता तो दूर, उसके पहले जो प्रत्येक क्षण चल रहा था, वो व्यक्ति हरेक काम में उसी लय को प्राप्त कर रहा था। मन के भीतर के विचारों का आवागमन अगले दिन ध्यान के साथ आया, परन्तु बड़ी ही कोमलता से वो विचार आवागमन करने लगे। जो किसी समय आक्रमण कर रहे थे, उस व्यक्ति को ध्यान के नए अर्थ मालूम चल चुकेे थे और अब वो व्यक्ति ध्यान की खुद के लिए नई परिभाषा गढ़ चुका था और अपने मन को एक अलग आनन्द दे चुका था। 

ध्यान की यात्रा सिर्फ उलझनों को दूर नहीं करती, जीवन में स्पष्टता को भी बढ़ाती है तथा इस परिभाषा को खोजने के लिए स्वयं के साथ एक यात्रा तय करनी होती है। 

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