नवरात्रि में दूसरे दिन करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा || Vaibhav Vyas


 नवरात्रि में दूसरे दिन करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा
गुप्त नवरात्रि शुरू हो चुके हैं ऐसे में मां की आराधना-उपासना से विशेष कामनाओं की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। चैत्र या वासंतिक नवरात्र और अश्विन या शारदीय नवरात्रों के अतिरिक्त दो और भी नवरात्र हैं जिनमें विशेष कामनाओं की सिद्धि की जाती है। गुप्त नवरात्रि में दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान, तपस्या और वैराग्य की देवी माना जाता है। कठोर साधना और ब्रह्म में लीन रहने के कारण भी इनको ब्रह्मचारिणी कहा गया है। विद्यार्थियों के लिए और तपस्वियों के लिए इनकी पूजा बहुत ही शुभ फलदायी होती है। जिनका स्वाधिष्ठान चक्र कमजोर हो उनके लिए भी मां ब्रह्मचारिणी की उपासना अत्यंत अनुकूल होती है। इसी वजह से मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना पूर्ण विधि-विधान करने से शुभ और शीघ्र फलदायी होती है। मां ब्रह्मचारिणी की उपासना के समय पीले अथवा सफेद वस्त्र धारण करें। मां को सफेद वस्तुएं अर्पित करें, जैसे- मिसरी, शक्कर या पंचामृत। ज्ञान और वैराग्य का कोई भी मंत्र जपा जा सकता है। वैसे मां ब्रह्मचारिणी के लिए ऊँ ऐं नम: मंत्र का जाप करना श्रेयष्कर रहता है। इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ खान-पान की दृष्टि से जलीय आहार और फलाहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
ब्रह्मचारिणी की कथा- पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी! आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की, यह आप से ही संभव थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौली शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं। मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होता है तभी शुभ फल और मनवांछित फलों की प्राप्ति संभव हो पाती है। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।

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