पदम् पुराण के ब्रह्म खंड में कहां गया है-
गंगाताम सरिता श्रेष्ठ: विष्णु ब्रह्मा महेश्वरा:
देव: तीर्थ पुष्करा तेश्थ्यम तुलसी दले।
अर्थात- गंगा आदि समस्त पवित्र नदी एवं ब्रह्मा विष्णु महेश्वर पुष्कर आदि समस्त तीर्थ सर्वथा तुलसी दल में विराजमान रहते हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि- समस्त पृथ्वी में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। वह तुलसी उद्विग्न के मूल में तीर्थ निवास करते हैं। तुलसी देवी की कृपा से भक्तवृंद कृष्ण भक्ति प्राप्त करते हैं और वृंदावनवास की योग्यता अर्जित करते हैं। वृंदादेवी तुलसीदेवी समस्त विश्व को पावन करने में सक्षम है और सब के द्वारा ही पूज्य है।
समस्त पुष्पों के मध्य वो सर्वश्रेष्ठ हैं और श्री हरि सारे देवता, ब्राह्मण और वैष्णवगण के आनंद का वर्धन करने वाली हैं। वे अतुलनीय और कृष्ण की जीवन स्वरूपनी हैं। जो नित्य तुलसी सेवा करते हैं वह समस्त क्लेश से मुक्त होकर अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करते हैं। अत: श्रीहरि की अत्यंत प्रिय तुलसी को जल दान अवश्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त इस समय भगवान से अभिन्न प्रकाश श्री शालिग्राम शिला को भी जल दान की व्यवस्था की जाती है।
शास्त्रों में तुलसी देवी को जल दान करने पर तुलसी के मूल में जो जल बच जाता है उसका भी विशेष महत्व वर्णित किया गया है। इस विषय में एक कहानी बताई गई है -एक समय एक वैष्णव तुलसी देवी को जल प्रदान कर और परिक्रमा करके घर वापस जा रहे थे कि कुछ समय पश्चात एक भूखा कुत्ता वहां आकर तुलसी देवी के मूल में पड़े हुए जल था उसको पीने लगा लेकिन तभी वहां एक बाघ आया और उसको कहने लगा - दुष्ट कुकुर! तुम क्यों मेरे घर में खाना चोरी करने आए हो और चोरी भी करना ठीक है लेकिन मिट्टी का बर्तन क्यों तोड़ कर आए हो? तुम्हारे लिए उचित दंड केवल मृत्युदंड है। इसके उपरांत बाघ उस कुत्ते को वही मार देता है और तभी यमदूत के गण उस कुत्ते को लेने आते हैं लेकिन उसी समय विष्णु दूतगण वहां आते हैं और उनको रोकते हैं।
कहते है यह कुत्ता पूर्व जन्म में जघन्य पाप करने के कारण नाना प्रकार के दंड पाने के योग्य हो गया था लेकिन केवल तुलसी के पौधे के मूल में पड़े जल का पान करने के फल से उसका समस्त पाप नष्ट हो चुका है और तो और वह विष्णु गमन करने की योग्यता अर्जित कर चुका है अत: वह कुत्ता सुंदर रूप को प्राप्त करता है और वैकुंठ के दूत गणों के साथ भगवद् धाम गमन करता है।
जगत जीवों को कृपा करने के उद्देश्य से ही भगवान की अतरंगशक्ति श्रीमती राधारानी का प्रकाश वृंदा तुलसी देवी के रूप में इस जगत में प्रकट हुआ है। उसी प्रकार भगवान श्री हरि भी बद्ध जीवो को माया के बंधन से मुक्त करने के लिए विचित्र लीला के माध्यम से अपने अभिन्न स्वरुप शालिग्राम शिला रूप में प्रकाशित हुए हैं। चारों वेदों के अध्ययन से लोगों को जो फल प्राप्त होता है केवल शालिग्राम शिला के अर्चना करने मात्र से ही वह पूर्ण फल प्राप्त किया जाना संभव है जो शालिग्राम शिला के स्नान जल, चरणामृत आदि को नित्य पान करते हैं वह महा पवित्र होते हैं एवं जीवन के अंत में भगवद धाम गमन करते हैं।
भगवान नारायण देवर्षि नारद से कहते हैं -
'वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी॥
एतन्नामाष्टकं चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम्।
य: पठेत् तां च सम्पूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥Ó
'वृंदा, वृंदावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नंदिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी ये देवी तुलसी के आठ नाम हैं। यह सार्थक नामावली स्तोत्र के रूप में परिणत है। जो पुरुष तुलसी की पूजा करके इस 'नामाष्टकÓ का पाठ करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है।

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