नवरात्रि का चौथा दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कुष्माण्डा की उपासना की जाती है। कुष्मांडा यानी कुम्हड़ा। कुष्मांडा एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है कुम्हड़ा, यानि कि- कद्दू, यानि कि पेठा, जिसका हम घर में सब्जी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। मां कुष्मांडा को कुम्हड़े की बलि बहुत ही प्रिय है, इसलिए मां दुर्गा का नाम कुष्मांडा पड़ा।
नवरात्रि के चौथे दिन पान के पत्ते में गुलाब की सात पंखुडिय़ा रखें और महालक्ष्मी मन्त्र पढ़ते हुये पान को देवी मां को चढ़ा दें। गुलाब के फूल में कपूर रखकर माता कुष्मांडा के सामने रखे। फिर माता महालक्ष्मी के मन्त्र का 6 माला जप करें। शाम के समय फूल में से कपूर लेकर जला दें और फूल देवी को चढ़ा दें।
नवरात्र के चौथे दिन इमली के पेड़ की डाल काट कर घर में ले आयें। इस डाल पर माता महालक्ष्मी के मन्त्र का 11 बार जप करें और फिर इसे अपने तिजोरी या धन रखने की स्थान पर रखने से अखंड लक्ष्मी की प्राप्ति होगी। नवरात्रि चतुर्थी की शाम में बेल के पेड़ की जड़ पर मिट्टी, इत्र, पत्थर और दही चढाएं और अगले दिन सुबह फिर से मिट्टी, इत्र, पत्थर और दही चढा कर, बेल के पेड़ के उत्तर पूर्व दिशा की एक छोटी टहनी तोड़कर घर ले आएं इस टहनी पर रोज 108 बार महालक्ष्मी मन्त्र पढिय़े और टहनी को नवमी के दिन तिजोरी में रखें।
जीवन में चल रही परेशानियों से जल्द छुटकारा पाने के लिए देवी मां के इस मंत्र का 108 बार जप करें। मंत्र है-
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनी।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
मनोविकार से बचने के लिए और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिये पूजा के बाद माता के आगे ध्यान मुद्रा में बैठकर इस मंत्र का 21 बार जप करे-
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
बौद्धिक क्षमता का विकास करने और विद्याध्ययन के लिए देवी मां के विद्या प्राप्ति मंत्र का 5 बार जप करना चाहिए। मंत्र है-
'या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
इच्छाओं की पूर्ति के लिये इस दिन देवी मां को मालपुओं का भोग लगाए और उनके इस मंत्र का 11 बार जप करें-
जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ाने के लिये देवी के शांति मंत्र का 21 बार जाप करें-
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

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