पौराणिक मान्यता के अनुसार स्कंदमाता ही हिमालय की पुत्री पार्वती हैं, जिन्हें माहेश्वरी और गौरी के नाम से भी जाना जाता है। स्कंदमाता कमल के पुष्प पर अभय मुद्रा में होती हैं। मां का रूप बहुत सुंदर है। उनके मुख पर तेज है। इनका वर्ण गौर है, इसलिए इन्हें देवी गौरी भी कहा जाता है। भगवान स्कंद यानि कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। स्कंदमाता प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं की सेनापति थीं। इस वजह से पुराणों में स्कंदमाता को कुमार और शक्ति नाम से महिमा का वर्णन है।
चैत्र नवरात्रि की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को प्रात: काल स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजन आरंभ करें। मां की प्रतिमा को गंगाजल से शुद्ध करें। इसके बाद फूल चढ़ाएं। मिष्ठान और 5 प्रकार के फलों का भोग लगाएं। कलश में पानी भरकर उसमें कुछ सिक्के डालें। इसके बाद पूजा का संकल्प लें। स्कंदमाता को रोली-कुमकुम लगाएं। मां की आरती उतारें तथा माता के मंत्र का जाप करते हुए एक माला अवश्क जाप करनी चाहिए।
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
स्कंदमाता का कवच
ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फट् बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु माँ देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥

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