विनायक चतुर्थी पर करें भगवान गणेश को प्रसन्न || Vaibhav Vyas


 विनायक चतुर्थी पर करें भगवान गणेश को प्रसन्न

माघ मास के शुक्ल पक्ष में गणेश जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। माघ मास शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी और गणेश जयंती के रूप में मान्यता प्राप्त है। पौराणिक मान्यता है कि माता पार्वती ने माघ शुक्ल चतुर्थी तिथि को गणेश जी को उत्पन्न किया था, इसलिए इस तिथि को गणेश जयंती मनाते हैं। इस बार चतुर्थी के दिन शिव योग एवं रवि योग में गणेश जयंती मनाई जाएगी। गणेश जयंती पर भगवान गणेश जी की पूजा का मुहूर्त दोपहर में 11.30 बजे लेकर दोपहर 1.41 बजे तक है। ऐसी मान्यता है कि गणेश जयंती के दिन चंद्रमा दर्शन वर्जित होता है। यह विनायक चतुर्थी है, इसमें चंद्रमा को देखने से मिथ्या कलंक लगता है। इस दिन व्रत हों या न हों, फिर भी इस दिन चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए।

कथाओं के अनुसार, माता पार्वर्ती के मन में जब पुत्र की इच्छा हुई, तो उन्होंने उबटन से गणेश जी की उत्पत्ति की थी। जिन लोगों को संतान की चाह होती है, उनको गणेश जयंती या माघ मास की शुक्ल पक्ष की विनायक चतुर्थी का व्रत रखना चाहिए। भगवान गणेश इस दिन अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं और उनको संकटों से उबारते हैं।

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। भगवान गौरी गणेश की प्रतिमा के सामने बैठकर या मंदिर में जाकर व्रत और पूजा का संकल्प लें। भगवान गणेश जी का विधि-विधान से पूजन करें। पूरे दिन नियम और संयम से रहकर व्रत रखें। शाम को सूर्यास्त के पहले फिर से नहाएं और भगवान गणेश का पूजन करें। विनायक चतुर्थी के दिन बप्पा का पवित्र मन से पूजन शीघ्र फलदायी माना गया है। इस दिन की पूजा-आराधना शुभ मुहूर्त के अनुसार करने से भी विघ्नहर्ता का आशीर्वाद मिलने वाला होता है। इस दिन व्रत के पश्चात कथा का श्रवण-वाचन अवश्य करना चाहिए जिससे व्रत का पूरा लाभ मिलने वाला होता है।

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थे। वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिए चौपड खेलने को कहा। भगवान शंकर चौपड खेलने के लिए तो तैयार हो गए। लेकिन इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा? इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बनाया, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते हैं। परंतु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है। इसलिए तुम बताना की हम में से कौन हारा और कौन जीता।

यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया। खेल तीन बार खेला गया और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गईं। खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई। और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने और कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऐसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऐसा नहीं किया। बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई।

एक साल बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं। नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालूम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए। और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए कहा। बालक ने कहा कि, हे विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए, कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों। बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अंतध्र्यान हो गए। बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया। और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई। उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गईं। देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताए अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया। इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिए जो नाराजगी थी वो स्वयं समाप्त हो गई।

पार्वती जी के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई। वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुंची। वहां पहुंचकर पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- भगवन! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ गई हूं। शिवजी ने गणेश व्रत का इतिहास उनसे कह दिया। यह व्रत विधि भगवान शंकर ने माता पार्वती को बताई। यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई। माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया। व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें। कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्रजी को बताया। विश्वामित्रजी ने व्रत करके गणेशजी से जन्म से मुक्त होकर 'ब्रह्म-ऋषिÓ होने का वर मांगा। गणेशजी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की। इस प्रकार श्री गणेशजी चतुर्थी व्रत को मनोकामना व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत को करने से वो सबकी मनोकामना पूरी करते है। इस तरह पूजन करने से भगवान श्रीगणेश अति प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं।

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