माघ मास की अमावस्या को माघी अमावस्या अथवा मौनी अमावस्या भी कहा जाता है। माना जाता है कि इस दिन मनु ऋषि का जन्म हुआ था। मनु शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है, इसलिए इस अमावस्या को मौनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। मौनी अमावस्या के दिन गंगा नदी के जल को अमृत के समान माना जाता है। इस दिन गंगाजल में देवताओं का वास होता है। इसलिए मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। मौनी अमावस्या के दिन स्नान के बाद दान-पुण्य का भी विशेष महत्व माना गया है। माना जाता है कि इस दिन दान-पुण्य करने से सौ गुना ज्यादा पुण्य प्राप्त होता है। मौनी अमावस्या के दिन श्रीहरि का पूजन किया जाता है। मौनी अमावस्या के दिन व्रत भी रखा जाता है। मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत रखने का भी विशेष महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि उच्चारण करके जाप करने से कई गुणा अधिक पुण्य मौन रहकर हरि का जाप करने से मिलता है।
मौन रहने का वास्तविक अर्थ है बाहरी दुनिया से दूर रहकर खुद के अंतर्मन में झांकना, आत्ममंथन करना और अंदर की अशुद्धियों को प्रभु का नाम लेकर दूर करना और मन को शुद्ध करना। मौन व्रत में मौन रहकर मन को एकाग्र करना होता है फिर एकांत में ध्यान-उपासना और प्रभु के नाम का स्मरण करना चाहिए। इससे नकारात्मकता दूर होती है और मन के भीतर तक आध्यात्मिकता का विकास होता है।
मौनी अमावस्या पर मौन व्रत का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि यदि व्यक्ति इस दिन संकल्प लेकर पूरे विधि विधान के साथ मौन व्रत रखता है तो उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मुनिपद की प्राप्ति होती है। अगर आप पूरे दिन मौन व्रत नहीं रख सकते हैं तो कम से कम स्नान और दान-पुण्य से पहले सवा घंटे का मौन व्रत जरूर रखें। इससे आपके पाप कटने के साथ आपको दान-पुण्य का 16 गुणा अधिक फल प्राप्त होगा।
मौनी अमावस्या के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर मन में व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन का न सही तो कम से कम स्नान और दान करने तक मौन धारण करें। गंगा स्नान करें और अगर अगर गंगा घाट पर नहीं जा सकते तो घर में पानी में गंगा जल मिलाकर स्नान करें। स्नान से पूर्व जल को प्रणाम करें और श्रीहरि का नाम लें। स्नान के बाद सूर्य को जल में काले तिल डालकर अघ्र्य दें, फिर नारायण की विधि विधान से पूजा करें। पूजा के बाद सामथ्र्य के अनुसार दान करें। अगर व्रत रखा है तो दिन में फल और जल ले सकते हैं।
महाभारत के एक दृष्टांत में इस बात का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि माघ मास के दिनों में अनेक तीर्थों का समागम होता है, वहीं पद्म पुराण में कहा गया है कि अन्य मास में जप, तप और दान से भगवान श्रीहरि विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि वे माघ मास में स्नान करने से होते हैं। यही वजह है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का खास महत्व का माना गया है। यह अमावस्या स्नान, दान और पुण्य के साथ ही श्रद्धालुओं के लिए कई हजार गुणा फलदायी मानी गई है। इस दिन हिन्दू धर्मावलंबी न केवल मौन व्रत रखते है बल्कि भगवान की पूजा-अर्चना भी करते है।
भगवान ब्रह्मा के स्वयंभू पुत्र हुए ऋषि मनु। इन्होंने आजीवन मौन रहकर तपस्या की थी इसीलिए इस तिथि को मौनी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन त्रिवेणी स्थल यानी 3 नदियों का संगम स्थान पर स्नान करने से तन की शुद्धि, मौन रहने से मन की शुद्धि और दान देने से धन की शुद्धि और वृद्धि होती है। मौनी अमावस्या के दिन मौन धारण करने का प्रचलन सनातन काल से चला आ रहा है। यह काल, एक दिन, एक मास, एक वर्ष या आजीवन भी हो सकता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन मौन धारण करने से विशेष ऊर्जा की प्राप्ति होती है। मौनी अमावस्या पर गंगा नदी में स्नान करने से दैहिक (शारीरिक), भौतिक (अनजाने में किया गया पाप), दैविक (ग्रहों, गोचरों का दुर्योग) तीनों प्रकार के मनुष्य के पाप दूर हो जाते हैं। इस दिन स्वर्ग लोक के सारे देवी-देवता गंगा में वास करते हैं, जो पापों से मुक्ति देते हैं। यह चंद्र तथा राहु प्रधान होती है इसलिए जिस व्यक्ति की कुंडली में इन ग्रहों से संबंधित परेशानियां हों, इस दिन उपाय करने से कई गुना फल की प्राप्ति होती है। हिन्दू धर्मग्रंथों में माघ मास को बेहद पवित्र माना गया है। ग्रंथों में ऐसा उल्लेख है कि इसी दिन से द्वापर युग का शुभारंभ हुआ था। यह अमावस्या दुख-दारिद्रय दूर करने तथा और सभी की सफलता दिलाने वाली मानी गई है।
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