जिस तरह जप के साथ तप की महिमा जुड़ी हुई है, उसी तरह दान के साथ में पुण्य की महिमा भी जुड़ी हुई है। जब हम बारह ही भावों की चर्चा करते हैं तो एकादश भाव पुण्य फलों के उदय का स्थान है। यही पुण्य फलों का उदय स्थान सर्वांगीण लाभ की स्थितियों से भी जुड़ा हुआ है। जीवन का जो भी हिस्सा है, संतान हो, रिहायश के लिए घर बनाना हो, गृहस्थ सुख की स्थितियां हो, समाज में किस तरह से नाम और प्रतिष्ठा प्राप्त होगी, हम अपने कर्म के साथ में अपने नाम को कितना एक ख्याति की ओर लेकर चलते चले जाएंगे, ये सब कुछ एकादश के सर्वांगीण लाभ की स्थितियों के साथ जुड़ा होता है।
प्रथम भाव है, पंचम भाव है और नवम भाव है ये तीनों ही त्रिकोण की स्थितियां हैं और इन तीनों त्रिकोणों में प्रथम भाव आत्मन के साथ जुड़ी होती है वहीं पंचम ज्ञान के अभ्योदय के साथ में और नवम आध्यात्मिक चिंतन के साथ में जुड़ा हुआ भाव है। जब भी व्यक्ति किसी भी विषय के भीतर तक उतरता है तो वहीं से उसका आध्यात्मिक चिंतन जन्म लेने लगता है। आध्यात्मिक चिंतन के साथ में हम इस दर्शन को प्राप्त करते हैं जैसे जीवन की प्लानिंग करनी है, उसी तरह से इस भव सागर से पार उतरने के लिए भी हमें अपनी योजनाएं लगातार बनानी है। तो जैसे जब व्यक्ति के तप और सिद्धि को बढ़ाते हैं उसी तरह से हम इस हाथ से दान दें और इस हाथ को मालूम नहीं चलने दें, वहीं पर दान की महिमा जाग्रत होने लगती है। मानवीय स्वभाव है जो भी करेगा वो कहीं न कहीं उसका बखान करता चला जाएगा, किन्तु जब भी हम दान की ओर जाएं उसमें मन की संतुष्टि के साथ में चलें, जब भी व्यक्ति वृद्धावस्था की ओर होगा या फिर कोई भी एक जगह छोड़ेगा और दूसरी जगह के साथ में मूव करने वाला होगा तो उसके साथ में पश्चात्ताप और संतुष्टि दोनों जुड़े होंगे। आपने कॉलेज लाइफ को पूरा किया तो वहां से कुछ रिग्रेट साथ में है, और संतुष्टि प्राप्त की वो भी साथ में है। एक जगह पांच वर्ष तक नौकरी की वहां कुछ लोगों की मदद की उस वजह से जाने भी जाएंगे तो कुछ गलतियां हुई उस वजह से भी आप जाने जाएंगे। यही स्थितियां संतुष्टि और पश्चात्ताप की है जो पूरे जीवन साथ चलती है। हमने जो हासिल किया भौतिकता के स्वरूप में, घर परिवार के लिए वो सारी स्थितियां अलग है, किन्तु इसके साथ में हम लोगों के लिए क्या कर रहे हैं, हमारी जितनी क्षमताएं ईश्वर ने प्रदान की है या हम अपने कर्म के सहारे जो हासिल कर रहे हैं उसके साथ में दान की महिमा को कैसे जोड़ते चले जा रहे हैं।
श्रीमद भगवत गीता में कृष्ण ने कहा है कि अग्नि धुएं के साथ में आवृत है। उसी तरह प्रत्येक कर्म में कहीं न कहीं नकारात्मकता साथ में चलने वाली होती है। उसी कर्म की नकारात्मकता को दूर करने के लिए दान की यह व्यवस्था और साथ ही विधा हम सभी के साथ में चलने वाली होती है। जहां पर भी हो जैसे भी हो जिस तरह भी हो हम इस अभ्योदय के स्तर को साथ में दान-पुण्य की स्थितियों को लेकर चलते चले जाएं इसीमें मन की संतुष्टि जाग्रत होने लगती है।
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