किसी नई कंपनी में जा रहे हैं, अपना कन्फर्ट जोन छोड़ेंगे, नए कन्फर्ट जोन की ओर जाएंगे, किन्तु सबसे पहले हम अपनी स्वाभाविकता भी खोते चले जाएंगे क्योंकि क्रेडिब्लिटी स्टेबलीज करनी है। नए बॉस आ रहे हैं, उनके बारे में जांच-पड़ताल पहले से करते चले जाएंगे क्योंकि वहां पर भी अपनी स्वाभाविकता रखनी है, कैसे प्रजेंट करेंगे, प्रयास यही होगा। व्यापारिक जीवन में किसी बड़े ओहदे के व्यक्ति से मिलने जा रहे हैं, जब वहां प्रवेश करेंगे, वहां बाहर निकलने तक उन चार से पांच घंटों में भी अपनी स्वाभाविकता खोते चले जाएंगे। बचपन से ही हम देखते हैं कि एक स्कूल से दूसरी स्कूल में गए। कॉलेज से दूसरी कॉलेज में गए या कॉलेज छोड़कर अब प्रोफेशनल लाइफ की ओर जा रहे हैं।
प्रत्येक क्षण व्यक्ति ऐसे समय के अंदर जब भी वह थ्रेस होल्ड पर होता है, सबसे पहले स्वाभाविकता खोता है। व्यापार नौकरी को छोड़ दें, घर में नई बहू आती है, नया रिश्ता जुड़ता है तो पहले सोचते हैं कि अभी तक इनका व्यवहार देखेंगे, कैसे बातचीत करते हैं, कितना विश्वास किया जा सकता है। उनके बाद इनके सम्मुख बात रखेंगे, तब तक हम स्वाभाविक नहीं रहेंगे। हम प्रयास करेंगे एक पोलिस्ड एप्रोच में रहें, कितना कहना है क्या कहना है। संवेदनाएं जतानी है, स्नेह जताना है उसमें भी बनावटीपन रहना चाहिए। गलती से भी यह गलती नहीं हो जाए कि हम कोई ऐसा स्टेटमेंट दे दे जिससे लंबे समय तक दुविधाएं हमारे साथ में चल रही हो। प्रूव करना घर परिवार में किसका आना, व्यापार में ऐसी स्थितियों में व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत छवि, मूलभूत प्रकृति से दूर होकर न जाने खुद को बनावटी स्तर के साथ लेकर चलता है। ऐसे क्षण व्यक्ति जब अपनी प्रकृति से दूर है, तो कैसे जुड़ाव स्थापित करेगा, किस तरह से मन के भीतर की संवेदनाएं दूसरों तक पहुंचाएगा, यह संभव नहीं हो पाता। इसी बनावटीपन को स्वाभाविकता मान लेते हैं, जबकि देखें दो से तीन साल का बच्चा खेल रहा है, हरेक व्यक्ति उसके प्रति आकार्षित होगा, उसकी लुभावनी मुस्कान की ओर, उसकी चंचलता को देखेगा, वजह है कि बच्चा स्वाभाविक है।
जहां पर भी कोई खिलाड़ी स्वाभाविक है तो खेल निखरता है। गायक पूर्ण रूप से स्वाभाविक है तो बहुत अच्छे से प्रफोर्मेस दे पाता है। जहां पर भी कांसियसनेस के साथ बनावटीपन हावी होता है वहीं पर अपनी स्थितियों और हुनर को खोने लगते हैं। प्रयास करे प्रत्येक समय ऐसी जीवन को स्थितियों को चुनौतियों को लाएगा, हम जितने स्वाभाविक रहेंगे, चिंताएं दूर रहेगी। सजगता आवश्यक है, किन्तु उसके साथ चिंता घुलमिलकर बनावटीपन सामने रखती है तो वो जीवन को कहीं-न-कहीं निराश्रय की ओर लेकर जाने वाली होती है। उससे बचने का प्रयास करना जीवन की सार्थकता और जीवन को नई उमंग के साथ जीवन का माध्यम है।
Comments
Post a Comment