जीवन में तुलना का बहुत ही विशिष्ट स्थान हैं, मानव मन हर चीज से तुलना कर एक को छोटी व एक को बड़ी निर्धारित कर देता हैं और यहीं से ही कम-ज्यादा, छोटा-बड़ा, सुख-दुख की शुरुआत होती हैं। हालांकि तुलना करके हम अपना विकास करें और इस विश्वास से करें कि यह ईर्ष्या भाव में नहीं तब्दील होगा। तब तो यह तुलना हमें सदैव जीवन में उन्नति प्रदान करेगी। लेकिन सिर्फ तुलना करके हम स्वयं को कम आंकने का ही काम करेंगे तो यह जीवन में निराशा के स्तर को बढ़ायेगा। हमें इस बात पर पूर्ण रुप से विश्वास होना चाहिए कि हम जहां है, जिस स्थान पर है वह हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है। उस स्थान की, उस पद की महिमा हम से ही है। हम सब कुछ नहीं हो सकते है, लेकिन हम जो हैं वो श्रेष्ठ है।
एक वृक्ष ने कभी पर्वत होने की इच्छा नहीं कि और ना ही इस संताप में जीवन निकाला कि मैं पर्वत क्यों नहीं हो सका अथवा तो नीम के वृक्ष ने कभी पीपल नहीं होना चाहा। बल्कि जो स्वयं हैं उसी में पूर्ण रुप से स्वयं को विकसित किया तो आज पीपल पूजनीय बन गया तो वहीं नीम औषधिय गुणों के साथ विकसित हुआ। हमारे भीतर जिस चीज का बीज प्रस्फुटित होगा उसी का विराट स्वरुप हम हो सकते हैं। उस बीज को पहचाननें की महत्ती आवश्यकता है और उसे अपने कर्म की खाद से विकसित भी करने की आवश्यकता है। यह तय बात है कि हम किसी के जैसे नहीं हो सकते लेकिन यह भी निश्चित है कि कोई हमारे जैसा भी नहीं हो सकता है। हर व्यक्ति का स्थान सुनिश्चित है, वहां पर संतुष्टि की कुर्सी लगाकर विश्राम के साथ बैठा जाएं और जीवन को पूर्णता के साथ देखा जाएं।
मुझसे आएं दिन लोग कहते हैं कि हम कोई किस्मत के धनी तो हैं नहीं और वैसे भी हर कोई सेलिब्रिटी तो हो नहीं सकता हैं। इन शब्दों में सच्चाई नहीं अपितु निराशा है। हम क्या नहीं हो सकते यह तय करने से कहीं बेहतर हैं कि हम यह तय करें कि हम क्या-क्या हो सकते हैं। बीज तो सबके भीतर हैं, बस आवश्यकता है तो उसे प्रस्फुटन के स्तर तक ले जाने की। जीवन में छोटा या बड़ा होने से कहीं अधिक आवश्यक हैं उपयोगी होना।
जी धन्यवाद
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