व्यक्ति की स्वयं की प्रकृति.Person's own nature

 व्यक्ति की स्वयं की प्रकृति पर ग्रहीय व्यवस्था के साथ में ही देश-काल और परिस्थिति का भी जुड़ाव और असर पूर्णरूपेण यहां दिखाई देता है। इसको एक उदाहरण से समझने की आवश्यकता है। एक व्यक्ति जिसकी कुंडली में देव गुरु वृहस्पति और बुध स्ट्रांग होल्ड पोजीशन्स के साथ में रहे। उसकी शुरुआत से ही जो रुचि या यह कह लीजिये कि जो वास्तविक प्रकृति है वो कहीं-न-कहीं लेखन के साथ में जुड़ सकती थी, किन्तु ऐसा व्यक्ति विशेष खेलकूद, स्पोर्टस पर्सनल्टी के माहौल के साथ में जो है, बड़ा होना शुरू होता है और कहीं-न-कहीं जबरदस्ती उसको उस खेलकूद की प्रक्रिया के साथ में जोडऩा होता है किन्तु मन बार-बार उच्चाट होता है और कहता है कि शायद मेरा क्षेत्र कोई और है। वह कॉलेज की तरफ बढ़ता है, मित्र मिलते हैं, जिनको लिटरेचर का बहुत ज्यादा शौक रहा तो कहीं-न-कहीं फिर से रुझान अपनी प्रकृति के साथ में जुड़ पाता है। इसी वजह से देश, काल और परिस्थिति तो हावी रहती ही है व्यक्तित्व के ऊपर किन्तु मूल स्तर के ऊपर व्यक्ति कहां जुड़ सकता है उसको भी ज्ञात करना बहुत ज्यादा आवश्यक है। और यह माता-पिता जब भी बच्चों को आब्जर्व करें या स्वयं भी किसी भी उम्र के वय के अंदर हों अपनी रुचि और रुझान भले ही 45 वर्ष की उम्र में मिले, 50 वर्ष की उम्र में मिले, जहां लगे कि हां यही क्षेत्र है, जहां मेरा जुड़ाव गहरे से हो सकता था तो वहां व्यक्ति को कार्य जरूर करना चाहिए। उस स्तर पर, उस उम्र पर भी सफलता की स्थितियां सामने उस क्षेत्र विशेष में आ सकती है। और जब व्यक्ति प्रयासशील रहता है, जब व्यक्ति कर्मशील रहता है, और स्वयं को सकारात्मक सोच के साथ में आगे बढ़ाता है तो इन दुविधाओं से पार पाकर अपने जीवन को एक अलग स्तर पर देख पाता है। तो एक सामंजस्य की आवश्यकता है कि देश, काल और परिस्थिति किस तरह से चल रही है। ग्रहीय व्यवस्थाएं क्या आधार बता रही है तो मूल प्रकृति अगर ग्रहीय व्यवस्था के साथ में जुड़ पाती है। दूसरी स्थितियां इतनी हावी नहीं रहे तो व्यक्ति को जो सफलता अपने क्षेत्र विशेष में मिलनी चाहिए वह वहां रिफलेक्शन्स में आती हुई दिखाई भी देती है।

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