इस नवग्रही व्यवस्था में मन का प्रभाव किसी ग्रह के साथ बहुत गहरे से जुड़ा हुआ है। तो वो है द्वितीय प्रकाश ग्रह चन्द्रमा और चन्द्रमा इस स्थिति के साथ में जीवन वृहद स्वरूप के साथ आगे बढ़ता है, दूसरी ओर चन्द्रमा की महादशा 10 वर्ष जीवन में चलती है। आप इन दस वर्षों में मन का प्रभाव निरंतर एक परिवर्तन के साथ देखते है और जब भीतर की ऊर्जा कार्याें में हस्तारिंत होती है। तो एक अलग प्रवाह सामने आता है।
आप किसी भी कार्यक्षेत्र में हो, वहां रूपये-पैसों की आवक और जावक चन्द्रमा की महादशा में तीव्र होती है।
लग्न में चन्द्रमा यदि स्वग्रही और उच्चस्थ हो केम्द्रुम या पापकर्तरी दोष में नहीं हो, पापी ग्रहों की इन पर दृष्टि नहीं हो, तो 10 वर्ष में चन्द्रमा की दशा व्यक्ति के वारे-न्यारे करके चली जाती है। सूर्य की दशा से तपकर जब व्यक्ति चन्द्रमा की दशा में प्रवेश करता है। तो वहीं से एक रूचिकर अवस्था में जीवन चलायमान होता चला जाता है। तो दूसरी ओर आप ये भी देखिए कि गृहस्थ जीवन का सहयोग भी व्यक्ति को भरपूर मिलता है, किंतु वो भावी भविष्य के प्रति उदासीन रहता है।
चन्द्रमा द्वितीय भाव में यदि स्वराशिस्थ हो तो धनागमन अच्छे से होता है। किंतु मंगल की युति हो जाएं तो वहां चन्द्र-मंगल का लक्ष्मी योग उतने फायदे नहीं देता। धन प्राप्त तो होता है, किंतु अज्ञात कारणों से खर्चे भी पूरे जीवन सताने वाले हो जाते है। मैं यहां एक और बात स्पष्ट कर दूं कि यदि चन्द्रमा धन भाव में क्षीण हो जाएं जो आप हासिल करना चाहते है उसका बिल्कुल उल्ट सामने आ जाता है। शनिदेव-चन्द्रमा का विष दोष बन जाएं तो मन विचारों से व्यक्ति को पूरी तरह से निराश कर देता है। कुटुम्बकीयजनों के साथ बारम्बार स्थितियां नकारात्मक होती चली जाती है। दूसरे स्तर पर आप ये भी देखिएं कि वाणी पर भी व्यक्ति का प्रभाव बहुत गहरा नहीं रहता।
तृतीय भाव के चन्द्रमा उतने बेहतर परिणामों को नहीं दिखाते किंतु अपनी महादशा में बार-बार गिरने पर भी भाग्य का सहयोग बारम्बार प्राप्त होता है।
चतुर्थ भाव में यदि चन्द्रमा उच्चस्थ या स्वग्रही हो, तो लोगों से नई जगह जाकर जुड़ने में कठिनाई नहीं होती है। आजीविका के माध्यम स्वयं चलकर सामने आते है। किंतु यदि यहीं नीचस्थ हो जाएं तो परेशानियां काफी हद तक बढ़ जा जाती है और इसी वजह से व्यक्ति बहुत अधिक भावुक हो जाता है तथा माता स्थान से कई बार दस वर्षों में दिक्कत परेशानियां जन्म लेती है।
पंचम भाव में चन्द्रमा हो और भले ही पापीग्रहों से आकृष्ट हो, किंतु ऐसी स्थितियों में लाभ बारम्बर निकलकर आता है। संतान पक्ष से इन दस वर्षों में दुविधाएं निकलती हैं, किंतु जो शिक्षा हासिल की है वो यहां मजबूती के साथ खड़ी रहती है।
षष्ठ भाव के चन्द्रमा हो और भले ही क्षीण हो, चाहे मजबूत हो, श्वांस संबंधित दुविधाएं मिलती है। शत्रु पूरे जीवन हावी होने का प्रयास करता है।
सप्तम भाव में चन्द्रमा यदि मजबूत हो तो तरल संबंधित व्यापार के साथ जीवन उच्चत्व को प्राप्त करता है। निर्णायक मौकों पर आत्मविश्वास से ज्यादा आत्म संवेदना काम आती है। इन दस वर्षों में व्यापार को परिवर्तित करने की मशाएं दस वर्षों तक साथ चलती है।
तो वहीं अष्टम भाव के चन्द्रमा हो तो मन अज्ञात की आशकांओं से घिरता चला जाता है। तो वहीं कुटुम्बकीयजनों का सहयोग प्राप्त नहीं होता है। इसी वजह से इन दस वर्षों में जीवन के संयोग ही सहयोग देते है।
नवम भाव के चन्द्रमा भले ही कमजोर स्थितियों में हो, किंतु मानसिक बल को मजबूत करते है। जिज्ञासाएं पानी के बहाव की तरह कुछ ना कुछ ढूंढती रहती है। वहीं जो अनुभव साथ में होते है वो ही आध्यात्मिक प्रगति की ओर भी लेकर जाते है।
दशम भाव के चन्द्रमा उत्तरोत्तर भले ही उच्चस्थ हो तो इन दस वर्षों में भूमि, भवन, लिक्विटीड़ी सब कुछ मिल जाते है। किंतु कमजोर हो, तो संघर्ष ही प्राप्त होते है।
एकादश भाव के चन्द्रमा हो, तो ये गौर करने लायक बात है कि पुण्य फलों का उदय बहुत देरी से होता है तथा संतान पक्ष की ओर यदि चन्द्रमा क्षीण हो तो काफी दुविधाएं निकलकर आती है।
द्वादश भाव के चन्द्रमा मन को भावुक रखते है, विदेश संबंधित गतिविधियों में सफलता साकार स्वरूप में मिलती है, तो वहीं दूसरी ओर श्वांस संबंधित दिक्कते सताती है तथा खर्चे आकस्मिक तौर पर निकलकर आते है।

I have kark lagna and Laxmi Yog in 11th house. Is the Mahadasha of the moon beneficial or malefic for me ?
ReplyDeleteविषय सम्बन्धित जानकारी के लिये आप हमारे जोधपुर कार्यालय के फोन नंबर 8905521197 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद।
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