संवाद और भाव I Dialogue and Emotion.

 

                                                        संवाद और भाव

ईश्वर ने हमें वाणी रुपी वरदान से सुशोभित किया है ताकि हम किसी अन्य व्यक्ति से संवाद के माध्यम से जुड़ सकें और भावों को व्यक्त कर सकें। ना सिर्फ वाणी अपितु हम हमारी आंखों से भी संवाद स्थापित करते हैं किसी अन्य कि बात जब सुनते है तो कान भी संवाद स्थापित करते हैं। कोई व्यक्ति यदि बोल-सुन नहीं सकता तो वह इशारों के माध्यम से अपनी बात अगले तक प्रेषित करता है। इन सभी बातों से एक ही चीज निकल कर आती है कि जीवन में संवाद महत्वपूर्ण है। 

   संवाद किसी भी माध्यम से हो वह भाव को जन्म देता हैं। वहीं भाव जीवन में रस लेकर आते हैं। व्यक्ति मानसिक चेतना के साथ जब जीवन में एक स्तर पर पहुंच जाता हैं तो वह ईश्वर या दैवीय ऊर्जा के साथ मानसिक संवाद को स्थापित कर लेता है। एकान्त में भी उसका संवाद परमात्मा के साथ है वहां से वह भावों का सृजन करता हैं।

   व्यक्ति कभी प्रेम प्रेषित कर रहा है तो कभी क्रोध, कभी करुणा तो कभी ईर्ष्या अर्थात कुछ न कुछ वो अपने भीतर से निरन्तर भेज ही रहा है। हमें हमारे संवाद किसी भी माध्यम से अन्य तक पहुंचाने होते है। इसलिए हमारे जीवन में हमसे भी ज्यादा अगर कोई महत्वपूर्ण है तो वह दूसरा व्यक्ति जिससे हम संवाद स्थापित कर भावों का सृजन करते हैं।

   आज के परिप्रेक्ष्य में हमारी ज्यादातर समस्याओं की जड़ संवाद बन गया है क्योंकि या तो संवाद ही नहीं हो पाता और अगर संवाद स्थापित हो भी जाता हैं तो भावों का सृजन नगण्य हो गया हैं। भाव शून्य होता जीवन मानसिक संवेदनाओं के लिए खतरनाक हैं। भावाभिव्यक्ति के साथ किया संवाद हमारे जीवन रस का मूल स्तोत्र हैं। जीवन जब तक ही हैं जब तक आपको भाव का रस है, जब भाव-रस नहीं रहेगा जब सिर्फ उम्र बचेगी जीवन नहीं बचेगा। इसलिए संवाद रहें, भाव रहें और जीवन जीवन्त रहें।
 

Comments

  1. संपूर्णत: आपके उक्त कथनसे सहमत हूं। यह एक कला है, एक शास्त्र भी है।
    परीश्रमसे यह प्रतिभा निखर सकती है किंतू यह भगवानकी असीम कृृृृपा और देन है, इसमें कोई शंका नही।
    ईश्वरकी यह कृृपा आपपर सदैव बनी रहे, यही प्रार्थना।

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    1. जी बहुत बहुत धन्यवाद

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  2. SIR
    🙏
    Very true.
    उससे भी उपर The way, you are explain any word, situation, or any emotion your language is very clear and आपकी भाषा समृद्धि का तो क्या कहना।!अपने आप में आप एक अध्यापन मंदिर हो। जहां मे सदा ज्ञान रुप आपकी आत्मा को नमन करती रहूंगी ।

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  3. जी बहुत बहुत आभार .

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