प्रतिद्वंद्वी कब शत्रु बन जाता है, यह मालूम ही नहीं चल पाता। एक आर्गेनाइजेशन में एक कलिग साथ में काम कर रहा है, जिसके साथ बहुत गहरी मित्रता वर्षों से रही, कॉलेज लाइफ में साथ में थे, उसके बाद जॉब में आ गए। घर-परिवार भी एक-दूसरे को बहुत अच्छे से जानते हैं। किन्तु अब इस आर्गेनाइजेशन में जो प्रमोशन होनी है वो एक ही व्यक्ति की होनी है तो वहीं से मन में एक गलत विचारधारा लगातार पनपने लगती है। कहीं-न-कहीं कम्पलेन करने की भावना मन में आती है या यह बताया जाता है कि हम बहुत अच्छा कार्य करते हैं, अगला व्यक्ति उस स्तर के ऊपर कार्य नहीं करता है। जबकि आर्गेनाइजेशन के अंदर चलते हुए धारणा यह थी कि कार्य बहुत अच्छे से किया जाए। खुद को स्थापित किया जाए। दूसरों का सहयोग करके एक तरह से जो हमारा कार्य यहां पर है, वो और सुदृढ़ तरीके से आगे बढ़ता चला जाए। किन्तु एक छोटी-सी प्रमोशन की स्थिति ने अब, जब हम यहां एक छोटी-सी प्रमोशन की स्थिति कह रहे हैं, अगले व्यक्ति को जो कि श्रोता है उन्हें यह लगने लगता है कि प्रमोशन छोटी स्थिति नहीं होती। 3 से 4 वर्षों की मेहनत होती है। उसके बाद में कुछ एचीव करने की तरफ जाते हैं।
आप जब भी 3 से 4 वर्षों की मेहनत करते हैं, वहां एक्सपीरियंस एचीव करते हैं, वहां रिलेसन के साथ में चलते हैं और जो तयशुदा मानक है जीवन के वो दशाओं के साथ में मिलते ही है। भले ही थोड़ा सा उसके अंदर देरी हो जाए। किन्तु उसके साथ रिश्तों को नकारात्मकता में लेकर आना कहां तक सही है, इसके बारे में विचार जरूर करना चाहिए। ऐसी स्थितियां कहीं-न-कहीं व्यक्ति के मन के भीतर भी एक आक्रोश को जन्म देने वाली हो जाती है। जो प्रतिद्वंद्वी एक तरह से स्तर के ऊपर हैल्दी काम्पीटीशिन के साथ चल सकते थे, वहीं से उनके भीतर एक दुराव आने लगता है। वहीं गृहस्थ जीवन के अंदर भी पति और पत्नी दोनों ही कार्य क्षेत्र के अंदर अग्रसर हैं। अगर वो अपनी-अपनी सैलरी को लेकर या बिजनस की पोजीशन को लेकर एक कम्पेरीजन के अंदर आने लगते हैं तो वहां पर भी रिश्तों के अंदर तल्खियां आनी शुरू हो जाती है। काम्पीटिशन जब तक हैल्दी पोजीशन्स पर रहे वो रिश्तों को कहीं-न-कहीं नर्चर करवाने वाला होता है। एक-दूसरे को प्रेरणा देने वाला होता है। नीचा दिखाने वाला नहीं होता। किन्तु जैसे ही वहां पर स्थितियों के अंदर थोड़ी सी पोलीटिक्स आने लगी, गरजस की पोजीशन आने लगी या हमारी सोच के अंदर वैयक्तिक स्तर पर कम्पलेन की एप्रोच आने लगी, वहीं से रिश्तों में एक तरह से दूरी आना शुरू हो जाती है।
जब भी क्रिकेट में एक ओपनिंग पार्टनरशिप आती है तो वहां पर दोनों ही कार्डिनेसन के साथ में चलते हैं। कभी भी इस पोजीशन के साथ में नहीं चलते हैं कि मैं ज्यादा गेंदें खेलकर बहुत अच्छे रन बना जाऊं या फिर अगले को स्ट्राइक की ओर ही नहीं आने दूं। ये भावना दुर्भावना से ग्रसित कही जाएगी। जबकि वहां जो व्यक्ति अच्छा प्रफार्म कर रहा है, उसको आगे बढऩे का अवसर दिया जाए, स्ट्राइक दी जाए तो और अच्छे से वो खेल की स्थितियां सामने निकलकर आने वाली रहेगी। तो काम्पीटिशन एक अलग बात है, वहां से शत्रुवत स्थितियों का पनपना एक बहुत अलग बात है। जब भी हम दूसरे व्यक्ति के कंधे के ऊपर हाथ रखकर यह कहते हैं कि भले ही तुम्हारे लिए चुनौतियों का अवसर है, समय है, मैं तुम्हारे साथ में खड़ा हूं। तो वहीं से हम उस व्यक्ति के साथ में या तो मेंटर की एप्रोच में जुड़ जाते हैं या फिर उसके भीतर हमारे प्रति एक सम्मान की स्थिति को बनाते चले जाते हैं। ये भी एक विचारणीय स्थिति है जिसके बारे में हमको मंथन जरूर करना चाहिए।
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