शुक्र की महादशा के प्रभाव
जिस युग में हम रह रहे है वहां भौतिकता आध्यात्मिकता पर हावी होती हुई नजर आती है। शुक्र ज्योतिष के शुरूआती स्तर का छात्र भी जानता है कि भौतिकता, चमक-दमक, साज-सज्जा, वक्ता में व्यांग्यात्मक शैली, खुद को प्रस्तुत करने की कला तथा कला संबंधित क्षेत्र विशेष में हस्तेक्षप बढ़ाने वाले ग्रह शुक्र ही है। शुक्र एक तरह से कहूं तो प्रतिक्षण जीवन को आनन्द का आधार देने वाले ग्रह भी है। जब व्यक्ति इस क्षण में जीता है तो वो संघर्षों में आनन्दित होगा और जो भविष्य की उम्मीदों के साथ आज को जीता है। वो चिंताओं को भी घोलता है।
शुक्र की 20 वर्ष की महादशा जीवन के बहुत सारे रंग दिखाती है। आप देखिएं कि कहने को दैत्य गुरु है, किंतु स्त्री कारक सौम्य ग्रह भी है। आखिरकार भौतिकता भी अपने चरम को प्राप्त करके ये कहती है कि अब आगे क्या है और वहीं से शुक्र जैसे ग्रह आध्यात्मिकता की राह बताने लगते है।
शुक्र की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा जब आती है तो व्यक्ति दूसरों के चमक-दमक भरे जीवन से बहुत प्रभावित होता है। अपने जीवन में वो सब कुछ हासिल करना जो सुविधाजनित सुख हो। उसकी आकांक्षाएं बढ़ने लगती है। मुझे लोग देखें तो ये कहें कि कब भाषा मधुर से बनावटी होने लगती है, मालूम ही नही चल पाता है किंतु आज के इस युग के साथ बात करूं तो ये अन्तर्दशा स्ट्रीट स्मार्ट बनाती है। तो वहीं व्यक्ति अपने कामकाजी जीवन में बस आकर्षण का केन्द्र बनकर रहना चाहता है।
सूर्य की अन्तर्दशा व्यक्ति को नए आधार स्वरूप में ये बताती है कि भौतिकता के साथ यदि कुछ हासिल करना है तो भागदौड़ आवश्यक है। मिलावट और दिखावट की दुनिया से दूर भीतर कुछ हासिल करना आवश्यक है।
तो वहीं यहां आध्यात्मिकता और भौतिकता की दद्दोजहद हावी होने लगती है किंतु यहां पूर्वाभास बहुत सहयोग देते है।
चन्द्रमा की अन्तर्दशा एक तरह से स्त्रीकारक सौम्य कारक की महादशा में मन के आधिपति स्त्रीकारक सौम्य ग्रह द्रुतगामी आधार की अन्तर्दशा है। यहां मन हर आकर्षण को अपनाना चाहता है। आप एक रूपये का खर्चा के मिजाज लेकर चल रहे है, सोच दो रूपये के खर्च की है तथा खर्चा ढ़ाई रूपये पहुंच जाता है। तो यहां हम को महत्वपूर्ण तरीके से देवी उपासना की ओर जरूर जाना चाहिए।
मंगल की अन्तर्दशा स्वाभाविक तौर पर व्यक्ति को आकर्षण का केन्द्र बनाती है ना चाहते हुए भी रिश्ते जुड़ते है ना चाहते हुए भी कई तरीके के काम सामने आते है। सही और गलत से दूर ये समय एक अलग दुनिया का रचयिता है। जहां प्रधानता सिर्फ चमक-दमक की है। वस्तु दाम देखकर अच्छी या बुरी तय होती है। यहां अपनी क्षमताओं के आंकलन में गलती नहीं करनी चाहिए।
राहु की अन्तर्दशा अंतर चेतनाओं में कुछ ऐसे भ्रम करती है कि व्यक्ति को अपने ही जीवन के साथ कुछ पश्चाताप सामने नजर आते है तथा जो हाल ही में वक्त बीतता है। उसी वक्त के साथ कुछ भ्रम और जन्म लेने लगते है। ऐसी स्थितियों से भी बचना चाहिए तथा दूसरी ओर ये भी समझने की आवश्यकता है कि आप भ्रम से हटकर यदि कामकाज में खुद को स्थायी कर देते हैं तो जीवन को अत्यधिक तौर के ऊपर बेहतर करते चले जाते है। लोगों को पढ़ने की ताकत यहां बहुत अच्छे से मिलती है। आकस्मिक धन लाभ के व्यक्ति को यहां बहुत संभलकर आगे चलना चाहिए।
गुरु की अन्तर्दशा इस समय का महत्वपूर्ण आधार है तथा शुक्र में बृहस्पति का ये समय बदलाव, आर्थिक लाभ जो कि संपन्नता लेकर आता है। ज्ञान जो कि लोगों के भी काम आता है। उसका आधार बनाती है। बहुत लम्बे समय से अटके हुए कामकाज में पूर्ण होते है। तो वहीं आप अपने जीवन में सारे प्रवाह से दूर हटकर एक सुकुन खोज सकते है।
शनिदेव की अन्तर्दशा में आपको बहुत अधिक संभलना चाहिए। मित्र ग्रहों की दशा होने के बावजूद प्रत्येक निर्णय में दो बार सोचा जाएं, लाभ से पहले हानि के बारे में सोचा जाएं तो अतिउत्तम है, तो वहीं मैं ये भी बता दूं कि इसी समय में आपको निर्णय-अनिर्णय की सारी ही विसंगतियों से दूर रहना चाहिए।
बुध की अन्तर्दशा आर्थिक पक्ष को संबल देती है, शेयर मार्केट और कमीशनिंग संबंधित कामकाज भी नया सूर्योदय प्राप्त होता है। तो साथ में ही आपकी भाषा शैली प्रखर अंदाज के साथ में लोगों को प्रभावित करती है।
केतु परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिस तरह से ध्वजा विजय का भी प्रतीक है, विद्रोह की प्रत्यक्ष अवस्था भी है, अनुमान से पहले कार्य का संपादन भी है। ये सब कुछ परिवर्तन सूर्य की महादशा के पहले केतु संकेत के रूप में देकर जाते है। पिता-पुत्र सूर्य और शनिदेव आध्यात्मिक है और जब व्यक्ति भौतिकता से रचे-बुने 20 वर्षों के समुन्द्र को पार करके प्रथम प्रकाश ग्रह सूर्योदय की दशा में प्रवेश करता है तो अब अन्तरचेतनाओं में कई बार भीषण द्वंद भी देखता है कि जो आर्थिक खर्च हुए क्या उन्हें किसी और उपयोग में लाया जा सकता था। आखिर ये दुविधाएं मोक्षकारक ग्रह केतु की अन्तर्दशा में एक पूर्णता भी लेकर आती है तथा आखिरकार व्यक्ति कर्म को ही शीर्ष स्थान देता है, भले ही उसे भौतिकता मिले या आध्यात्मिकता।

Katu ki mahadasha
ReplyDeleteमनुष्य के जीवनमें शुक्र ना हो तो क्या रह जाता है? कइ बार बारहवे स्थानमें या किसी और वजहसें शुक्र खराब हों तो क्या करे??
ReplyDeleteसदैव की तरह ही,सुंदर विश्लेषण.. लगभग डेढ वर्ष पूर्व मेरी शुक्र महादशा प्रारंभ हुई है..बहुत कुछ आपका कथन सत्यापित होता हुआ..मेष लग्न ,तुला राशि और फिर भी नीच राशिस्थ शुक्र वही सब कमाल आप द्वारा वर्णित कर रहा है..जय हो पंडित जी..
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