केतु की महादशा के प्रभाव (Effects of Ketu Mahadasha)


 

केतु की महादशा के प्रभाव 

मोक्ष कारक ग्रह तो वहीं पापी ग्रह की संज्ञा के साथ उपमा विराजित ग्रह जो कि तीव्रता के साथ कई बार भ्रम देते हैं तो कई बार यही भ्रम व्यक्ति को उलझनों से निकालकर स्पष्टता की राह पर भी लेकर जाने वाले होते हैं। केतु मंगल की तरह फल देने वाले ग्रह हैं। वहीं मंगल ग्रहों में सेनापति हैं तो केतु को संस्कृत में ध्वज की उपमा दी गई हैं। ध्वज विद्रोह और विजय दोनों की ही प्रतीक हैं। 

जब मन के भीतर के विद्रोह इतनी बलशाली हो जाये की वो भीतर ना रहकर बाहर आ जाये जिनको रोकना संभव नहीं हो तो समझ लिजिये की केतु महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यन्तर की अवस्था में अब सामने हैं। 

सात वर्ष तथा नवग्रहों का अंतर्दशा काल बड़ी तीव्रता के साथ निकलता हैं। मंगल और केतु की महादशा में एक बहुत बड़ा अंतर मैने ये भी देखा हैं कि मंगल कार्य करने के बाद अनुभव दिलवाते हैं किंतु ये अनुभव लंबे समय तक साथ नहीं चलते। केतु भी कार्य करने के बाद में ही अनुभव दिलवाते हैं बहुत ज्यादा सोच विचार के भ्रम में व्यक्ति नहीं रहता किंतु अंतर्चेतनाओं में सबकुछ समाहित रहता हैं तथा वहीं दूसरी ओर भीतर के अंतर जब मिट जाते हैं तो व्यक्ति वहीं करने के लिए बाध्य होता हैं जो अभी हाल ही में सामने हैं। 

केतु की महादशा में  व्यक्ति को थोड़ी सी स्वीकारोक्ति बढ़ाकर चलना चाहिए तथा जो आज मिला हैं वो कल भी मिलेगा और कल के बाद परसों उससे दुगुना मिलेगा ऐसे भ्रम से मुक्त रहना चाहिए। 

केतु की महादशा में इन्हीं की अन्तर्दशा कई बार लोगों के प्रति राय बनाने की जल्दबाजी को सामने रखती हैं। तो वहीं ऐसी स्थिति में उलझने बढ़ती चली जाती हैं जिनसे बचना चाहिए। 

केतु काम-काज की जमीन तैयार करते हैं तो वहीं केतु के बाद शुक्र की अन्तर्दशा व्यक्ति के द्वारा शुरू किये कार्यों में बहुत जल्दबाजी के साथ परिणाम भी सामने रखती हैं। आप एक जगह नौकरी लगे हैं और सोचिये की छह महीनों में बहुत बड़ी जिम्मेदारी दे दी जाये उस जिम्मेदारी के साथ ये भी निश्चित हो जाये की अगले छह महीनों में प्रमोशन हो जायेगा ऐसी अवस्थाएं कई बार केतु में शुक्र की अन्तर्दशा लेकर आती हैं। 

सूर्य यदि कमजोर स्थितियों में हो तो केतु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का समय अंतराल काफी हद तक व्यक्ति के आत्मविश्वास पर आघात करता हैं जब हमने निर्णय लिये तो पूरा विश्वास था कि ये काम हो जायेगा वहीं से स्थितियां उलट जाये तो व्यक्ति स्वयं पर से विश्वास का आधार ही खो देता हैं इसी वजह से प्रकाश ग्रह की अन्तर्दशा में सभंलना चाहिए। 

चन्द्रमा की अन्तर्दशा मन में कभी संवेदनाएं देती हैं तो कभी इतना संकुचित कर देती हैं कि जिन बातों के बारे में हमारे विशाल हृदय ने कभी सोचा भी नहीं था वहां पर भी हम स्वयं को दुविधाओं में धकेल देते हैं किंतु ये समय आकस्मिक, आर्थिक वृद्धि के सोपान भी सामने रखता हैं। 

 मंगलवत् फल करने वाले केतु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा स्वभाव में उग्रता देती हैं निर्णय सही लेने से ज्यादा गलतियों के साथ सामने आते हैं जो कभी हितेषी रहे हैं वहीं हमें पुराने दुश्मन लगने लगते हैं। ऐसे लोगों की बातों पर विश्वास करना जो कि हमेशा नकारात्मक ही रहें हैं ये सबकुछ सामने आता हैं। ऐसी प्रवृत्तियों से बचना चाहिए। 

राहू की इन अन्तर्दशा में व्यक्ति को दुश्मनों से सावधान रहना चाहिए। अब यहां दुश्मन बाहरी नहीं होते आंतरिक भी होते हैं। आलस्य तथा संशय प्रमुख तौर पर हैं किंतु आपने वर्षों से कोई कहानी मन के अंदर गढ़ी हैं तो वो पुस्तक का स्वरूप ले सकती हैं। रचनात्मक सोच के साथ चले हैं तो यही सोच यहां कार्य में तब्दील हो जाती हैं किंतु नसों संबंधी विकार भी परेशान करते हैं। 

बृहस्पति की अन्तर्दशा में ये ध्वज नामक ग्रह ज्ञान के आधार पर तीव्र करते हैं व्यक्ति की जिज्ञासाएं तीव्रगामी होती हैं और हम सभी को ज्ञात हैं कि जिज्ञासाओं के बाद मिला ज्ञान व्यक्ति को कई बार आंकठ भी देता हैं उससे भी बचना चाहिए। 

वहीं बृहस्पति की अन्तर्दशा रूकी हुई प्रमोशन बिगड़े हुए रिश्तों को संभालने में मदद करती हैं। 

शनिदेव की अंतर्दशा रफ्तार और धीमेपन की झुंझलाहट के साथ चलने वाली होती हैं। व्यक्ति को अपने कत्र्तव्य का बोध हैं किंतु गलतीयां परेशान कर सकती हैं। ये बात भी सत्य हैं कि आपने कोई कार्य व्यवसाय बहुत पहले किया था अब उसकी शुरूआत फिर से करने का मौका भी सामने आता हैं। 

बुध की अंतर्दशा मानसिक स्तर पर जाती हुई केतु की महादशा में कई बार विचलित कर देती हैैं तो वहीं सोचना उसके बाद कार्य करना ये प्रवृत्ति यहां सामने आती हैं। बुध को जब तीक्ष्णता या यूं कहूं कि बुद्धि को जब तीक्ष्णता मिल जाये तो असंभव भी सहजता से संभव हो जाते हैं। 

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