बुध की महादशा के प्रभाव (Effects of Mercury Mahadasha)

 



बुध की महादशा के प्रभाव


जीवन हर क्षण वर्तमान को पीछे छोड़ता हैं और स्मृतियां बनाता चला जाता हैं। यही स्मृतियां तार्किक तौर पर ये बताती हैं कि हमारा कर्म किसी लक्ष्य से प्रेरित था। जीवन के लक्ष्य हर उम्र के साथ बदलते हैं या यूं कहें कि उम्र लक्ष्य को बदलना सीखा देती हैं। लक्ष्य मानसिक अवचेतन का प्रमुख आधार हैं तथा मानसिकता प्रति क्षण हो रहें बदलाव का एक स्वरूप मात्र हैं। युवा बदलाव लेकर आता हैं क्योंकि उसकी प्रकृति बदलाव की ऊर्जा से प्रेरित हैं। मैने उपरोक्त पंक्तियों में तीन प्रमुख बात कहीं हैं पहला मानसिकता दूसरा युवा तथा तीसरा बदलाव।

नवग्रहीय व्यवस्था में ये तीनों ही गुण सारगर्भित तौर पर बुध के साथ जुड़े हैं। पारे की प्रकृति का ये ग्रह जो बदलाव की प्रवृत्ति को सहज स्वीकारोक्ति देता हैं तथा बुद्धि कौशल ही एक मात्र ऐसा कौशल हैं जो सारे ही कौशल को मांजने की शक्ति देने वाला जन्मदाता हैं।  ये स्थिति भी बुध के साथ जुड़ी हुई हैं। कहने को नपुंसक ग्रह हैं किंतु प्रभाव वाणी पर हैं, वाणिज्य पर हैं, वक्ताओं की वक्तृत्व क्षमता पर हैं। तो जब इस ग्रह की स्थितियां ऐसी हैं तो दशाओं के प्रभाव में इस बात को स्मृतियों में जरूर रखियेगा कि ये ग्रह किसी भी ग्रह के साथ में विराजित होगा उसके गुण धर्म तो अपनायेगा ही तो दूसरी ओर बुद्धि में भी सापेक्ष तौर पर उन सारे ही गुणों की तीव्रता बनती चली जायेगी। 

विषय पर आता हूं हालांकि उपरोक्त पंक्तियां भटकाव नहीं होकर ज्योतिष के साथ जुड़े आध्यात्मिक चिंतन का स्वरूप मात्र हैं। चिंताऐं  मन को कुण्ठित करती हैं तो वहीं आध्यात्मिक चिंतन जीवन को आनंदित करता हैं। एक तरह से आध्यात्म की अविरल गंगा में व्यक्ति जब उतर जाता हैं तो चित्त को शांत भी करता हैं और अपनी यात्रा पर भी उसी प्रवाह के साथ निकलता हैं। 

बुध की महादशा में जब बुध की अन्तर्दशा चल रही हो तो मानसिक स्तर के ऊपर व्यक्ति बारम्बार चिंताओं के साथ स्वयं को घेरता हैं अव्यवस्थित होता नहीं हैं किंतु मानसिक तौर पर मिले व्यवधान उसे अव्यवस्थित कर देते हैं। व्यक्ति की सोच यहां अर्थ प्रधान होने लगती हैं 17 वर्षों की शुरूआत के इन वर्षों में स्वाभाविकता खोने लगती हैं। किसी भी वस्तु को ज्यादा चमका देना भी उसकी सुंदरता को दूर करने वाला होता हैं। सहज वृत्ति के साथ चलते हुए व्यक्ति को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए। 

बुध में केतु की अन्तर्दशा ठहराव को जगह नहीं देती। बदलाव इतना तीव्र होता हैं कि बुद्धि भी कई बार भ्रमित होने लगती हैं। यहां निर्णय और अनिर्णय के मौके नहीं मिलते। कब आप निर्णय ले लेते हैं मालुम ही नहीं चल पाता। 

बुध में शुक्र की अन्तर्दशा धनागमन बढ़ाती हैं। बुद्धि भौतिकता और चमक दमक से बहुत अधिक प्रभावित होती हैं और वहीं भाग दौड़ इन वर्षों में आर्थिक पक्ष को सुदृढ़ करती चली जाती हैं। आकस्मिक धन लाभ के क्षेत्र से जुड़े महानुभावों के लिए ये समय प्रभावशाली होता हैं। 

बुध में सूर्य की अन्तर्दशा यदि सूर्य मजबूत स्थितियों में हो तो व्यक्तित्व में नैतिकता जाग्रत होती हैं। बुद्धि कौशल यहां बारम्बार न्यायोचित तरीकों से व्यक्ति को नकारात्मकता से बचाने वाला होता हैं। ये भी स्मृतियों में रखना चाहिए कि सूर्यदेव की अन्तर्दशा बुध की दशा में बनी सहज स्वीकारोक्ति को कम कर सकती हैं। 

चन्द्रमा की अन्तर्दशा नपुंसक ग्रह की महादशा में मन को नकारात्मकता के बोध के साथ में और अधिक तीव्र कर देती हैं। बुध बुद्धि के आधिपति हैं तो वहीं चन्द्रमा मन का आधार लेकर चलते हैं। इसी वजह से इस अन्तर्दशा में व्यक्ति को गणपति और शिव आराधना को अपना आधार बनाकर चलना चाहिए। कई बार व्यक्ति स्थिर हो जाये, रूक जाये और ये देख ले कि वो कहां जा रहा हैं तो उसी से स्पष्टता आने लगती हैं। 

मंगल की अन्तर्दशा में झुंझलाहट से व्यक्ति का परिचय करवाती हैं। मंगल व्यक्ति के भीतर की ऊर्जा के वाहक ग्रह हैं। इसी वजह से ये समय काफी हद तक रिश्तों में उतार चढ़ाव लेकर आता हैं किंतु लंबे समय से अटके हुए काम काज तथा राह से भटके हुए मानस भी अपनी गलतियों को पहचानने की ओर जा पाते हैं। 

राहू की अन्तर्दशा में व्यक्ति अपने भीतर के अनुभव से अलग तरीके का परिचय प्राप्त करता हैं। प्रत्येक महादशा में एक ऐसा समय आता हैं जब उस दशा में मिले अनुभवों की जाग्रति होती हैं। राहू कुछ ऐसा ही बुध की महादशा में करते हैं। तो दूसरी ओर सुक्ष्मातिसुक्ष्म विवेचन भी मन के भीतर जगह प्राप्त करता हैं। 

बृहस्पति की अन्तर्दशा में मानसिक अवरोध मिलते हैं बहुत अधिक सोचते रह जाना सिर्फ बुद्धि कौशल का प्रयोग करना, व्यावहारिकता को भूल जाना, अपनी चिंताओं को सबसे बड़ा बनाकर आंकना इन दशा की बड़ी नकारात्मकता हैं। यहां अपने अविरल प्रवाह को रोकने से बचना चाहिए। 

शनिदेव की अन्तर्दशा धीरे-धीरे बदलाव लेकर आती हैं। बुद्धि, चेतन और अवचेतन के साथ जुड़ाव महसूस करती हैं तो वहीं स्थायित्व संबंधी कामकाज भी यहां से व्यक्ति के जीवन में अर्थ तंत्र का नव आलोक लेकर आते हैं। 

   


 

Comments

Post a Comment