आमतौर पर जब मेष लग्न की कुण्ड़ली हो और बृहस्पति द्वितीय भाव में हो तो कारक भाव की हानि करने वाले हो जाते है। तो वहीं इस बात को भी गौर करना होगा कि शुक्र के राशिस्थान में देवगुरु बृहस्पति परिणामों में संभावित तौर पर धीमापन देते है, किंतु जब बृहस्पति इस भाव पणफर में होंगे तो व्यक्तिगत तौर पर मेरा ऐसा भी अनुभव है कि ऐसा व्यक्तित्व कुटुम्बकीयजनों के बीच में प्रिय रहता है। इनसे जुड़ाव तथा संबंध बेहतरी के साथ रहते है, तो वहीं ये भी बात दृष्टिगोचर होती है कि ऐसा व्यक्ति सीमित धन शुरूआत जीवन में जरूर कमाएं, किंतु उसको संचित बहुत अच्छे से कर पाता है।
हम कई बार कलाकारों की आवाज में जो भारीपन देखते है, जो ज्ञान का प्रस्फुटन देखते है, जो बात कही जाएं वो तार्किक रहें, इसके पीछे का बहुत बड़ा आधार देवगुरु स्वयं बनाने वाले होते है, हालांकि भाग्येश का द्वितीय भाव में होना कमजोर स्थितियों को दिखाता है, किंतु द्वादशेश जब धन भाव में हो तो वैसे भी वृद्धि मिलती है और साथ ही साथ ये भी महसूस करना आवश्यक है कि पेट संबंधित व्याधियां कई बार सताती है। क्योंकि बृहस्पति की 5वीं दृष्टि षष्ठ भाव पर रहती है।
प्रमुख तौर पर ये भी देखा गया है कि ऐसा व्यक्ति यदि कोई ऋण लेता है तो उसे चुकाने की जल्दबाजी में रहता है, कर्म में थकान नहीं होती, स्वप्रबंधन जीवन का एक प्रमुख माध्यम रहता है।
Comments
Post a Comment