व्यक्ति दो स्थितियों में अपने जीवन को कई बार देखता है। पहले तो माया के अधीन होकर चलना, कितनी फाइनेंसियल केलकुलेशन्स हासिल की जा सकती है। खुद को अर्थ तंत्र के साथ में कितना जोड़ा जा सकता है और दूसरा प्रेम। जब काया धीरे-धीरे असमर्थ होने लगती है तो काया के अधीन होकर चलना।
स्वच्छंद रूप से जीवन तभी जीया जा सकता है जब व्यक्ति न काया के अधीन हो पूर्ण रूप से और न ही माया के अधीन हो। वो रास्ता आध्यात्मिकता का है, जहां भौतिकता की कुछ हद तक मौजूद है, जो हमारे गृहस्थ कार्य हैं वो पूर्ण रूप से वहां संचालित होते हैं। तो वहीं पर व्यक्ति कहीं-न-कहीं परम तत्व की ओर अग्रसर भी हो पाता है। ये दो पॉइंट क्यों है? जिनके बारे में हमको विचार जरूर करना चाहिए।
जब युवावस्था के अंदर है तो कितना माया के अधीन है। किस स्तर के ऊपर हैं तो वहीं कितना काया को हम समय दे रहे हैं, जिससे कि आगे जाकर काया के अधीन नहीं होना पड़े। यह एक स्थिति है जिसके बारे में व्यक्ति को जरूर विचार करना चाहिए।
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