स्व आंकलन I Self assessment I

 एक लेखक, जिसने पुस्तक लिखी और पांच वर्ष पहले उसको समाप्त कर दिया था, पब्लिश भी हो गई लोगों का रेस्पोंस भी बहुत अच्छा मिला। वो इन वर्षों के अंतराल के बाद उस पुस्तक के पन्नों को खंगालता है फिर से यह समझने का प्रयास करता है कि उसने पांच वर्ष पूर्व क्या लिखा था। कई जगह उसको त्रुटियां नजर आती है और ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं मेरी इस पुस्तक में बहुत ज्यादा कमियां रही। तो वहीं एक दूसरा व्यक्ति विशेष और है। उसने भी एक पुस्तक लिखी तीन साल पहले और फिर जब उसको पुनः देखा  तो बड़ा ही आनन्दित हुआ कि मैं उस समय भी बहुत अच्छा लिखता था आज भी बहुत अच्छा लिख रहा हूं। उस समय भी सर्वश्रेष्ठ दिया था, और आज भी सर्वश्रेष्ठ देता चला जा रहा हूं। 

एक व्यक्ति ने अपने आंकलन में प्रोग्रेसिव एप्रोच को रोक दिया तो दूसरे व्यक्ति ने अपने ही कामकाज में अनुभव की विजय से, सीखने की वजह से त्रुटियों को जांचा और परखा। लगने लगा कि जो अनुभव मैंने लिया है उस समय बहुत सीमित था, आज मैं बहुत अधिक परिपक्व हो चुका हूं। 

जब व्यक्ति ऐसे ही जस्टिफिकेशन के प्रोसेस के साथ में जाता है और अपने ही कामकाज में जो पूर्व पथ पर किया गया काम है उसमें त्रुटियां देखने का प्रयास करता है कि कुछ न कुछ कमी है तो निरन्तर सीख रहा है, प्रोगेस कर रहा है। उसका वालविंग प्रोसेस चलता चला जा रहा है। 

हम आई.टी. फील्ड में कार्य कर रहे हैं, हम ज्योतिषिय क्षेत्र के साथ में कार्य कर रहे हैं, हम रेडियो जॉकी हैं, हम कोई भी ऐसा क्षेत्र विशेष है जहां पर खुद को डवलप करने की जो पोजीशन है प्रत्येक दिन निकल कर आती है। और जब भी व्यक्ति पिछले दिन से आज का आंकलन करे और अगर उसको उसमें कमी नजर आए तो समझ लीजिये वो लगातार अपने प्रोसेस को डवलप करता चला जा रहा है। तो यह एक वस्तुस्थिति है जिससे व्यक्ति स्वयं का आंकलन बहुत अच्छे से कर सकता है। और सीखने की प्रवृत्तियां कहीं भी उसको रोकती नहीं है।

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