मेष लग्न की कुण्डली में लग्न भाव में बृहस्पति का होना

बृहस्पति (गुरू) जो कि सबसे अधिक कारकत्व प्राप्त ग्रह है। जहां द्वितीय भाव  धन को दर्शाता है उसका कारकत्व देवगुरु के पास है, तो वहीं प्रमुख तौर पर पंचम भाव, जो कि शिक्षा, संतान, आकस्मिक धन लाभ को दर्शाता है। नवम इति भाग्य, आध्यात्म, दशम जो कि कर्म की श्रेष्ठता है तो वहीं एकादश पुण्य फलों के उदय का स्थान है, और साथ में ही, प्रमुख तौर पर ये ही भाव सर्वांगीण लाभ का भी है और जब ऐसा कारकत्व प्राप्त ग्रह, मंगल प्रधान लग्नकुण्ड़ली में, लग्न में हो तो आप ये पाएंगे कि तीनों ही त्रिकोणों के ऊपर देवगुरु का नियंत्रण हो जाता है ।

     यदि आप मेष लग्न के जातक है तो ये भी महसूस करेंगे कि शिक्षा जो ग्रहण की वो कामकाजी जीवन में श्रेष्ठता देती है, शिक्षा संबंधित कामकाज के साथ भाग्य जुड़ता है, तो वहीं ऐसा व्यक्ति धैर्यवान बहुत होता है। ये ध्यान रखना बहुत आवश्यक है कि बृहस्पति लग्न में हो, और लग्नाधिपति मंगल हो, तो ऐसी अवस्था में ग्रह कौनसे नक्षत्र को लिए हुए है, ये समझना भी आवश्यक होता है।

     वहीं जब व्यापार, की बात होती है और बृहस्पति की दशा ही युवा अवस्था में चल रही हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने कामकाजी क्षेत्र में भी अग्रगामी रहता है। प्रमुख तौर पर जो ये आधार है, इसमें ये ही कहा जा सकता है कि निरंतर गतिमान ये जीवन काफी कुछ हासिल करता है, आध्यात्मिक चेतना प्राप्त होती है विदेश संबंधित कामकाज में भी वाहवाही मिलती है। यदि बृहस्पति युवा अंश में है तो और अधिक फायदा मिलता है।

     बृहस्पति की दशा में या अंतर्दशा में महत्वपूर्ण निर्णय लेना जीवन को संभालने की स्थिति मात्र है।

 


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