विश्वास की दो प्रक्रियाएं बहुत महत्वपूर्ण है। एक तो व्यक्ति अपने भीतर जो विश्वास की प्रवृति है उसको इतना अच्छे से जागृत कर ले या उसको आत्मविश्वास की स्थितियों में इतने गहरे से लेकर चला जाए कि कोई भी नकारात्मकता, तनाव या फिर आकस्मिक तौर पर जो संघर्ष आते हैं वो उसको विचलित करने वाले नहीं रहें।
आपने जब किसी कार्य की चुनौती को अपने साथ में जोड़ लिया तो उसके बाद में नकारात्मकता से क्या डरना। उसके बाद में उसकी जो कॉनसीक्वेंसी निकल कर आती है उससे क्या डरना। जब हम अपनी रफ्तार के साथ में चल निकले हैं तो अपने भीतर की लौ को बहुत गहरे से प्रज्जवलित करके रखें और प्रत्येक कार्य में अपने पूरे उत्साह को बनाकर रखें। जहां पर धैर्य भी हो, जहां साहस भी हो, जहां स्वयं के भीतर का विश्वास भी हो, उद्वेलित करने वाली स्थितियां बिलकुल भी जन्म नहीं ले तो दूसरी स्थिति यह भी है कि व्यक्ति एक कदम आगे बढ़े और उसके बाद आसपास के लोगों से पूछे- ये कहे और सुनने का प्रयास करे कि क्या हमने यह कार्य सही किया है? या फिर इसकी शुरुआत बिलकुल सही है? लोग कहें कि हां आपने बिलकुल सही किया है। उसके आधार पर ही हम अगला कदम आगे बढ़ाने वाले हों। ऐसी स्थितियों के साथ में व्यक्ति को बार-बार रुकना पड़ता है, बार-बार थकना पड़ता है। और जहां पर भी डिमोटिवेशन का वो शिकार होता है, वहीं थककर बैठ जाता है।
लक्ष्य उसके सामने था, किन्तु मोटिवेशन नहीं मिल पाया इसकी वजह से वह हार गया। कई बार स्थितियां देखी है कि 99वें प्रतिशत तक व्यक्ति अपनी रफ्तार के साथ चलता रहा। बहुत अच्छे लेवल के साथ में चला, किन्तु एक पोजीशन ऐसी आई जहां पर उसको एक तरह से मोटिवेशन नहीं मिला। उसने अपनी रफ्तार को रोककर रख दिया और उसी कार्य में एक नकारात्मकता भी सामने आती हुई दिखाई दी। तो इसी वजह से सबसे बढिय़ा और सबसे बेहतरीन प्रक्रिया यही है कि व्यक्ति स्वयं पर विश्वास रखे और हरेक दिन इसका अभ्यास भी करता चला जाए। यह अभ्यास मनोनुकूल तो नहीं होता, किन्तु यह अभ्यास व्यक्ति की सफलता के अनुकूल जरूर होता है।
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