मेष लग्न की कुण्ड़ली में षष्ठ भाव में देवगुरु बृहस्पति. Jupiter in 6th House in Aries ascendant horoscope

                                             मेष लग्न की कुण्ड़ली में षष्ठ भाव में देवगुरु बृहस्पति

बुध और बृहस्पति में आपस में शत्रुता है, एक ज्ञान के अधिपति है, ग्रहों में वृद्ध ग्रह है, तो वहीं दूसरी ओर बुध ग्रहों में युवराज है जिसके साथ रहते है उन्हीं की प्रकृति अपना लेते है। तो वहीं जब मेष लग्न की कुण्ड़ली को षष्ठ भाव बुध का राशि स्थान हो जाता है और जब बृहस्पति षष्ठ भाव में होते है तो व्यक्ति को अपने ही ज्ञान और अनुभव पर पूरे जीवन संशय रहता है। उसके द्वारा सबसे बड़ी गलती जो कई बार होती है वो ऋण को लेकर होती है, ऋण लेने में जहां पर भी लापरवाही बरती जाती है, वहीं दुविधाएं उत्पन्न हो जाती है तथा पेट से संबंधित दिक्कते भी जीवन में कई बार परेशान करती है। 

बृहस्पति का भाग्येश होकर मेष लग्न की कुण्ड़ली में षष्ठ भाव में हो जाना भी भाग्य को निम्नता दे देता है, जहां व्यक्ति उम्मीद और आस बांधता है वहीं वो चिंताओं में बंध जाता है। किंतु एक बात जरूर है कि षष्ठ भाव से देवगुरु बृहस्पति जब अपने राशिस्थान और द्वादश भाव को देखते है तो विदेश संबंधित कार्यो में उन्नति प्राप्त होती है, एक बार सबक लेने के बाद गलत खर्चों की ओर व्यक्ति नहीं जाता।

9वीं दृष्टि हो धन भाव पर होती है और देवगुरु बृहस्पति का अपना कारक भाव भी है ये स्थान, तो इसी आधार पर ये समय प्रमुखतया धनागमन देता है, कुटुम्बकीयजनों का सहयोग प्राप्त होता है, व्यक्ति मृदुभाषिता में रहता है, देखिएं नकारात्मकता और सकारात्मकता जीवन में एक साथ चलती है जहां कुछ चीजें जीवन में नहीं है तो वहीं 5वीं दृष्टि जब कर्म भाव को देख रही हो तो कितनी ही बाधाएं आएं व्यक्ति अपने कर्मशीलता को नही छोड़ता और यहीं से जीवन सुधार की अपेक्षा के साथ चलता चला जाता है। पिता के साथ कामकाज में सफलता प्राप्त होती है।   


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